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मन को समझो तो जान लो: कोसारे महाराज

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 मन को समझो तो जान लो: कोसारे महाराज 

आखिर हमारे मन में क्या समाया है :

दो अक्षरों के इस मन में संसार की सारी बातें समाहित हैं। सागर के गगार में मिलने की बात मन की बात में सौ फीसदी सच साबित होती है। जब मोर खुश होता है तो पंख फैलाकर अपनी खुशी का इजहार करता है और अगले ही पल अपने ही पैरों को देखकर दुखी हो जाता है। मानव मन भी एक क्षण में प्रसन्न होकर नाचना चाहता है और दूसरे क्षण उदास हो जाता है।

विचारों के सागर में डुबकी लगाओ :

हर लहर के साथ जीवन का अनुभव करने के लिए तैयार हो जाइए। लेकिन कुछ मामलों में बड़े नखरे भी करते हैं। उसे मनाना हमारा काम है और वह मान जाता है, ठीक उसी तरह जैसे एक कोमल पंखुड़ी जो अभी-अभी बारिश की बूंदों को छू गई है। हर व्यक्ति की अपनी सोच का दायरा होता है। मन नकारात्मक और सकारात्मक दोनों तरह से सोचता है। इसको समझना बहुत मुश्किल है।

हम जीवन भर इसके ताने-बाने में उलझे रहते हैं :

ऋषि-मुनियों से लेकर वैज्ञानिकों और दार्शनिकों ने इस पर टिप्पणी की है, फिर भी वे मन को नहीं समझ पाए हैं। मन रेत के ढेर की तरह काम करता है. कभी रुकना चाहता है, कभी नदी के पानी की तरह बहना चाहता है। रुकना मन की नियति नहीं है, हर पल हिलना चाहता है, हलचल मचा देता है। ठीक उस जिद्दी बच्चे की तरह, जिसे थोड़ी देर डांट पड़ती है, लेकिन फिर अपनी बात मनवाने की जिद करने लगता है।

हाँ, मन वही करता है:

हम लाख समझाते हैं, फिर भी नहीं माने आखिर हार मानने के बाद हम वही करते हैं जो हमारा मन चाहता है। हम कार्य करते हैं क्योंकि हम असीम रूप से हृदय से प्रेम करते हैं। प्यार के मामले में मन बहुत उलझाता है। कभी-कभी पल भर में अच्छा लगता है. प्यारा लगता है, लेकिन अगर वह प्रिय व्यक्ति समय पर फोन नहीं करता है, तो मन बड़े सवाल और कई शंकाएं पैदा करता है। प्यार के रास्ते में ब्रेक लगा देता है तो बात की गहराई खत्म होने में देर नहीं लगती। मन बीते लम्हों को यादगार बनाना चाहता है, इसलिए हम कल्पना से खुश रहने के लिए दिन, महीने और साल बिताते हैं।

इस उल्लास में मन फिर चंचल हो जाता है:

वह अपना काम करने लगता है। मन वास्तविकता को पहचानता है। इस कड़वे सच के साथ वह यूटोपिया जाना नहीं भूलते। शायद यही मन का भोजन है, जिससे वह अपने आप को स्वस्थ रखता है। बुरे समय में मन आशा के बीज बोता है। कहते हैं, हार मत मानो, अभी अच्छा समय आना बाकी है। मन यह कहते हुए जाग उठता है कि मन ने हारे हुए हारे हैं, मन जीतता है।

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कोसारे महाराज :- संस्थापक व राष्ट्रीय अध्य्क्ष

मानव हित कल्याण सेवा संस्था नागपुर

 

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