अंधकार और प्रकाश एक सिक्के के दो पहलू हैं। अंधकार के अस्तित्व को समाप्त करने के लिए प्रकाश का होना आवश्यक है। अंतः जहाँ अंधकार रहेगा, वहाँ प्रकाश भी विद्यमान होगा। जहाँ प्रकाश होगा, वहाँ अंधकार भी होगा। प्रकाश का महत्व भी तभी हैं, जब अंधकार है। भव्य पुरुष उस अंधकार की बात कर रहा है, जो मनुष्य के मन के भीतर विद्यमान है। इससे मनुष्य सोचने-समझने की शक्ति खो देता है। यह अंधकार दुख तथा निराशा से उपजता है। इसे ज्ञान रूपी प्रकाश से दूर किया जा सकता है। लोग सोचते हैं कि अंधा आदमी अंधकार में जीता होगा। उनकी धारणा मूलतः गलत है। अंधे आदमी को अंधकार का क्या पता! अंधकार का तुम्हें पता है, क्योंकि तुम्हारे पास आंख है। जब तुम आंख बंद करते हो तो अंधकार दिखाई पड़ता है। लेकिन अंधे को नहीं दिखाई पड़ता। जैसे-जैसे आदमी का अहंकार बढ़ा है…और इस सदी में बहुत बढ़ गया है! और बढ़ने के कारण भी हैं–विज्ञान का विकास, नई-नई तकनीकों की खोज, आकाश में उड़ना, चांद पर पहुंच जाना, एवरेस्ट की चढ़ाई। और आदमी को लगने लगा–मैं सब कुछ हूं! मैं सब कुछ कर सकता हूं! किसी प्रार्थना की, किसी पूजा की, किसी अर्चना की मुझे जरूरत नहीं है। मेरी बुद्धि, मेरा बुद्धिबल, मेरा विज्ञान, मेरा उद्यम सब हल कर लेगा। जो कल अज्ञात था, आज ज्ञात है। जो आज अज्ञात है वह कल ज्ञात हो जाएगा। अहंकार ने इस सदी में खूब फैलाव किया है, खूब विस्तार किया है। और जितना अहंकार बड़ा हुआ उतना ही परमात्मा तिरोहित होता चला गया। फिर हम पूछते हैं: परमात्मा कहां है?
( कोसारे महाराज )
अंधकार और प्रकाश एक सिक्के के दो पहलू हैं।

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